अध्याय तीन

गजानना को गोसाई,  गांजा रहा पिलाय

चरण वन्दना के लिये,  भक्तन की भरमार। मधुमक्खी सम भक्तजन, शहद गजानन प्यार ॥
एक दिवस श्री गजानना,  आसन बिराजमान। पूरब लाली छा रही, पक्षी करते गान ॥
अंधकार भागा गुफा, उगता सूरज देख। शीतल पवन चली चले, राम नाम की टेक ॥
प्रभात बेल सुहावनी, इक साधू आ जाय।झोली बगल दबाय के,  चिन्दी शीश कषाय ॥
दर्शन की आशा लिये,  बैठा एक किनार। अवसर मुझको ना मिले, दर्शन भीड़ अपार ॥
काशी में कीरत सुनी,  मन में ली यह ठान। जाऊंगा शेगांव मैं ,दरशन को श्रीमान ॥
भोग चढ़ाऊं भांग का, ऐसा व्रत मन माय। मगर यहां श्री चरण के,  दर्शन की गति नाय ॥
मानी सम्मानी धनी,  सभ्य सभी हैं लोग। मनवा की बातें कहूं,  नहीं स्थान यह योग ॥
गोसाई मन सोचते,  कैसे दर्शन पाय। जो जिसको भाये वही,  अपने इष्ट चढ़ाय ॥
अन्तर्यामी गजानना,  जाने मन की बात। अपने पास बुला लिया,  ला मेरी सौगात ॥
तीन माह झोली रखी, पुड़िया आज निकाल। चरणों में लोटन लगा, साधू होय निहाल ॥
हाथ जुड़े डरते- डरते, बोला फिर गोसाइ। बूटी याद रखें अगर,  याद रहे गोसाइ ॥
मैं जानूं श्री आपको,  बूटी से नहि काम। याद सदा मेरी रहे,  ऐसा दो वरदान ॥
मैं बालक लघु आपका,  इच्छा पूरण होय। वानरि अंजनि कोख से, जन्म शिवा का होय ॥
आप स्वयं साक्षात शिव, करो नहीं इनकार। बूटी भूषण आपका, व्यसन जगत व्यवहार ॥
कुछ सोचा,  फिर हां कहें,  श्री गजानन महराज। गोसाई को वर दिया, चिलम पियें महराज ॥
कीचड़ में ज्यों कमल रहे,  वैसे श्री महाराज। रहते जग व्यवहार में , अनासक्त महराज ॥
वेद ऋचा उच्चारते , कभी कभी महराज। राग अनेकों जानते,  गायक सम महराज ॥
चन्दल चावल बेल की, ये पद बहुत पसन्द। गाते थे आनन्द से महाराज ये छन्द ॥
भजन गायं गण गण कभी, कभी धार लें मौन। वन-वन में भटके कभी, या शैय्या पर सौन ॥

जानराव संकट टला


Gajanan-Vijay-Granth-Chapter – 3

जानराव बीमार था,  अन्त समय आ जाय। नाड़ी देखे बैद कहे,  अब नाही बच पाय ॥
सगे सम्बन्धी रो रहे,  दुख में डूबत जाय। हाय मनाए देव कई,  मिला न कोई उपाय ॥
सब सोचें बंकट घरे,  इक अवतारी आय। पंढरपुर शेगांव बना,  जब से वे प्रगटाय ॥
अवतारी यदि ठान लें,  जानराव बच जाय। जस ज्ञानेश्वर माउली,  सचिदानन्द उठाय
जानराव का इक सगा, बंकट के घर जाय। बंकट के घर जायके,  सारा हाल सुनाय ॥
चरणामृत महराज का,  अगर हमें मिल जय। जानराव की जान बचे, जस अमृत मिल जाय ॥
बंकट ने तब यूं कहा, मेरी नहीं बिसात। चरणामृत यदि चाहिये, विनय करें मम तात ॥
तुरत भवानीराम जी, जल श्री चरण लगाय। आज्ञा मांगे तीर्थ यह,  जानराव को जाय ॥
श्री की आज्ञा पाय के,  दिया सगे को तीर्थ। उसने जाय मरीज को, पिला दिया वह तीर्थ ॥
जानराव की जान बची,  चमत्कार यह जान। नर नारी सब खुश हुए,  श्री का मिला प्रमाण
जानराव ने उसी समय,  औषधि कर दी बन्द। हफ्ते भर तीरथ लिया,  तबियत हुई बुलन्द ॥
तबियत हुई बुलन्द तो,  दर्शन को वह आय । तीरथ अमरत सम हुआ,  कथा यही बतलाय ॥
सन्त नहीं थे गजानना,  कलियुग के भगवान। किन्तु मरण तो है अटल,  नियम प्रकृति जान ॥
सन्त नियम ना टालते टालें वे विपदाय। भारी संकट प्राण पर,  सहज रीति टल जाय ॥
शरण अनन्या भाव से, जो चरणन में जाय। शीत उसे की दूर हो,  अगन शरण जो आय ॥
अधि भौतिक अधि दैविक,  अरु आध्यात्मिक होय। तीन तरह के मरण हैं, बात ज्ञान की होय ॥
भक्ति भजन में मरण हो, या समाधि हो ध्यान। यह तो कभी न टल सके, बात गूढ़ यह जान ॥
अधि भौतिक जो मरण हो, टाल सके है बैद। अधि दैविक को टाल सके,  मंत्र जाप अरु वेद ॥
जानराव के मरण को,  जस टालें महराज। षट विकार से दूर जो,  कर सकता यह काज ॥
पीतल पीला देखकर,  स्वर्ण समझियो नाहि। वस्र गेरुवा देखकर, साधू समझो नाही ॥
श्री गजानन महराज जी,  सच्चे योगी जान। जानराव की जान बची,  करके तीरथ पान।॥
जान बची महराज जी,  करने लगे विचार। चमत्कार करने लगूं,  चाहेगा संसार ॥
कर विचार श्री गजानना,  धारे उग्र स्वरुप । सभी देख घबराय पर,  भक्त रहे गुपचूप
नहीं डरे प्रहलाद भगत,  नरसिंह के अवतार। बाघिन के बच्चे भला,  मां से क्यों भयजार ॥

विठुबा माली ढोंग करे, मार खाय भग जाय


एक कथा अब और सुनो, सच्चे हैं यह बोल। कस्तूरी के संग बढ़े,  मिटटी का भी मोल ॥
चन्दन का यदि साथ हो,  हिवर सुगन्धि पाय। पाय सुगंधि तो हिवर,  क्या चन्दन बन जाय ॥
साधू जन रहते जहां,  मन्दमती भी होय। हीरा पत्थर साथ में,  एक खान में होय ॥
एक खान में होय पै,  हीरे का हो मोल। पत्थर पैरों रुंधता,  कोई करे न तौल ॥
इसी तरह एक मंदमती,  महाराज के साथ। सेवाधारी रूप में, रहता था दिन रात ॥
बातें सेवा की करे,  अंतर में कुछ और। महराज के नाम पर,  माल मलाई चोर ॥
मैं तो श्री का लाडला,  चिलम भरूँ मैं रोज। महराज की चाकरी,  मैं ही करता रोज ॥
लोगों से कहता फिरै,  मो बिन चलै न काम | शिव का नन्दी बन गया,  मालि विठूबा नाम ॥
श्री जी तो सब जानते,  घटना इक घट जाय। किसी गांव से भक्तगण,  श्री दर्शन को आय ॥
महराज तब सो रहे,  उनको कौन जगाय। आप विठूबा लाड़ले,  श्री दरशन करवाय ॥
सुन तारीफ विठूबा माली,  फूला नहीं समाय। तुरत जगा महराज को,  दर्शन दिये कराय ॥
दरशन उनके हो गये,  संकट माली आय। कर्म किये का फल मिला, विठुबा लाठी खाय ॥
लाठी मारे जायं श्री,  खबर विठू की लेय। भूला तू औकात क्या,  धन्धा करता होय ॥
नीच नराधम चोर पर,  दया कभी ना होय। शक्कर समझूं सोम को,  यह गलती ना होय ॥
खूब ठुकाई जब हुई,  भागा विठू माली। लौट कभी आया नहीं,  भक्त रहा जाली ॥
श्री जी सच्चे सन्त थे,  षठ का साथ न होय। काम जहां हो धर्म का,  वहं व्यापार न होय ॥
रक्षण सबका सन्त करें,  भेद करें गुण दोष। पत्थर मांगा कल्पतरु,  यही विठोबा दोष ॥
गण गण गणात बोते बोले,  जय जय गजानना। राणा हैं शेगांव के,  योगी गजानना ॥

श्री हरिहरार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥
(तीसरा अध्याय समाप्त )